हरिद्वार से चारधाम तक ‘अहिंदू निषेध’ की गूंज,  गंगा घाटों की मर्यादा को लेकर श्री गंगा सभा का बड़ा कदम

रिपोर्ट दिशा शर्मा जनहित इंडिया

हरिद्वार से चारधाम तक ‘अहिंदू निषेध’ की गूंज,

गंगा घाटों की मर्यादा को लेकर श्री गंगा सभा का बड़ा कदम


हरिद्वार।धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा की पावनता, घाटों की मर्यादा और धार्मिक परंपराओं की रक्षा को लेकर श्री गंगा सभा ने सख्त रुख अपनाया है। सभा ने हर की पौड़ी सहित सभी गंगा घाटों और प्रमुख धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को वर्जित किए जाने की मांग की है। इसी क्रम में कई घाटों और धार्मिक स्थलों पर “अहिंदू निषेध क्षेत्र” के बोर्ड भी लगाए गए हैं, जिससे यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जा सके कि इन स्थलों की धार्मिक गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

श्री गंगा सभा सचिव उज्ज्वल पंडित का कहना है कि हाल के वर्षों में गंगा घाटों पर धार्मिक आस्थाओं के विपरीत गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे सनातन परंपराओं और श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है। सभा के पदाधिकारियों का तर्क है कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक हैं और उनके घाटों पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का पालन अनिवार्य है। ऐसे में गैर-हिंदुओं का अनियंत्रित प्रवेश इन परंपराओं को प्रभावित करता है।

सभा का यह स्वर अब केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसकी गूंज पूरे उत्तराखंड में सुनाई देने लगी है। जानकारी के अनुसार चारधाम क्षेत्र—बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री—में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की दिशा में निर्णय सामने आए हैं। चारधाम की स्थानीय धार्मिक संस्थाओं और तीर्थ पुरोहितों ने भी इस विषय पर सहमति जताते हुए कहा है कि देवभूमि की धार्मिक पहचान और पवित्रता को बनाए रखना आवश्यक है।श्री गंगा सभा के पदाधिकारियों का कहना है कि यह कदम किसी समुदाय विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि धार्मिक स्थलों की मर्यादा, शुद्धता और परंपराओं की रक्षा के लिए उठाया गया है। उन्होंने प्रशासन से भी मांग की है कि इस निर्णय को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं और गंगा घाटों पर नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए।हालांकि इस फैसले को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों के बीच बहस भी शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे धार्मिक आस्था की रक्षा का कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में देख रहे हैं। फिलहाल, हरिद्वार से लेकर चारधाम तक इस निर्णय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है और आने वाले दिनों में इस पर प्रशासनिक एवं राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा तेज होने की संभावना है।