राष्ट्रपति पुलिस पदक मामले में उठे सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग
देश जनहित | रिपोर्ट: देश जनहित
देहरादून। उत्तराखंड पुलिस के कुछ अधिकारी-कर्मचारियों को राष्ट्रपति पुलिस पदक एवं केंद्रीय गृह मंत्री पदक से संबंधित प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल अब चर्चा का विषय बन गए हैं। मामला सामने आने के बाद यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर ऐसी स्थिति किन परिस्थितियों में बनी और इसके लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जानी चाहिए।
पुलिसकर्मियों को मिलने वाले ऐसे सम्मान उनकी वर्षों की सेवा, कर्तव्यनिष्ठा और उत्कृष्ट कार्यों की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान होते हैं। ऐसे में यदि किसी पात्र पुलिसकर्मी का नाम प्रक्रिया में शामिल होने के बावजूद अंतिम रूप से सम्मान से वंचित रह गया है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
आखिर चूक कहां हुई?
मामले में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित पुलिसकर्मियों के प्रस्ताव किस स्तर से तैयार किए गए, उनका परीक्षण किन अधिकारियों द्वारा किया गया और प्रस्ताव आगे भेजने की प्रक्रिया में क्या-क्या कार्रवाई हुई।
यदि प्रस्ताव निर्धारित समय पर भेजे गए थे तो अंतिम सूची में नाम क्यों नहीं पहुंच पाए, यह भी जांच का महत्वपूर्ण विषय है। वहीं यदि प्रक्रिया में किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
पुलिसकर्मियों के सम्मान और मनोबल से जुड़ा मामला
उत्तराखंड पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में अपनी सेवाएं देते हैं। ऐसे में सम्मान से जुड़ी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की लापरवाही पुलिसकर्मियों के मनोबल को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए पूरे प्रकरण को किसी व्यक्ति या विभाग को दोषी ठहराने के बजाय तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए। निष्पक्ष जांच हो, वास्तविक स्थिति सामने आए और यदि कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
सरकार से पारदर्शी जांच की अपेक्षा
इस मामले में सरकार, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय से अपेक्षा है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच कराई जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि पदक से संबंधित प्रस्ताव की प्रक्रिया में किस-किस स्तर पर कार्रवाई हुई और यदि कहीं कोई चूक हुई तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है।
सम्मान के वास्तविक हकदार पुलिसकर्मियों को उनका सम्मान मिले और यदि कहीं लापरवाही हुई है तो दोषी की जवाबदेही तय हो—यही इस मामले में न्यायसंगत कदम होगा।
